Thursday, 11 January 2018

मूर्तियाँ बन रही रही है, पर हॉस्पिटल के लिए पैसे नहीं

मूमूर्तियाँ बन रही रही है, पर हॉस्पिटल के लिए पैसे नहीं??????

देशभर में राज्य सरकारे इस समय मूर्तियों के लिए 4 बड़े प्रोजेक्ट पर पैसा खर्च कर रही है. इन चारो प्रोजेक्ट की लागत जोड़े तो करीब 6939 करोड़ रूपये अनुमानित है. केवल मुर्तिया बनाने के लिए गुजरात, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश और उतरप्रदेश की सरकारे यह राशी खर्च कर रही है. मध्यप्रदेश की सरकार आदि शंकराचार्य की 108 फिट ऊँची मूर्ति बनवा रही है. इसकी लागत तय नही हुई है, मगर एक अनुमान के मुताबित इस पर लगभग 200 करोड़ रूपये खर्च हो सकते है. इसके लिए सरकार एकात्मक यात्रा निकल रही है.
इन चारो मूर्तियों के अलावा देश में निजी संस्थान और मंदिर ट्रस्ट भी भव्य मुर्तिया स्थापित में लगे है. तेलंगाना में संत रामानुजाचार्य की 216 फिट ऊँची परतिमा बनाई जा रही है. इसका निर्माण मंदिर ट्रस्ट करवा रहा है. यह विश्व की दूसरी सबसे बड़ी बैठी हुई परतिमा होगी. इसके अलावा राजस्थान में एक निजी समूह नाथद्वारा में शिवाजी परतिमा बनवा रहा है. इसकी ऊंचाई 351 फिट है. इस तरह कुल 6 बड़ी मूर्तियों पर काम चल रहा है. जबकि इन्ही राज्यों में कई जरूरी काम पैसो की कमी से रुके पड़े है.
ये राज्य वित्तीय संकट से भी जूझ रहे है. जैसे मध्यप्रदेश की बात करे तो किसी भी बड़े राज्य के लिए 200 करोड़ की राशी मायने नही रखती, लेकिन वर्तमान में मध्यप्रदेश की वित्तीय स्तिथि ठीक नही है. राज्य सरकार ने सड़क निर्माण का पैसा जुटाने के लिए पेंट्रोल डीजल पर 50 पैसे सेस लगा दिया. इसी तरह ऐन वित्तीय वर्ष की समाप्ति से पहले प्रोपर्टी की रजिस्ट्री शुल्क भी 10 फीसदी तक बढ़ा दिया है. जीएसटी लगी होने के बाद राजस्व में कमी और चुनाव वर्ष में लोकलुभावन योजनाओं के लागु किये जाने के दबाव के चलते प्रदेश सरकार ने 5 करोड़ रूपये के अधिक के भुगतानों पर पहले ही रोक लगा दी है. जिसका असर निर्माण कार्यो पर दिखने लगा है. न ही सडको का काम नियत गति से चल रहा है और न ही नये स्कूलों के अथवा नये अस्पतालों का निर्माण या रेनोवेसन हो पा रहा है.

गुजरात- मूर्ति के लिए 2989 करोड़ रूपये की मांग 17,620 करोड़ रूपये का लोन
यहां बन रही है – गुजरात में बन रही स्टेच्यु ऑफ़ यूनिटी में 2989 करोड़ रूपये लग रहे है. इसका 70 प्रतिशत कार्य पुरा हो गया है . लौह पुरुष सरदार पटेल की 182 मीटर इस प्रतिमा पर अब तक 1100 करोड़ रूपये खर्च हो चुके है. जुलाई 2018 तक इसके तयार हो जाने का अनुमान है.
जबकि सौराष्ट्र में पानी पहुचाने के लिए चाहिए 4600 करोड़ रुपये
इसी गुजरात सरकार ने विविध विकाश योजनाओ के लिए इंटरनेशनल एजेंसियों के पास से 17,620 करोड़ रूपये के सॉफ्ट लोन के लिए केंद्र सरकार को पर्स्ताव भेजा है. सौराष्ट्र अंचल में नर्मदा का पानी पहचानी की महत्वकांक्षी सौनी योजना के लिए 4600 करोड़ रूपये चाहिए. दूसरी और वर्ल्ड बैंक एवं जापानी जाईका जैसी एंजेंसियो की की फंडिंग से मेट्रो रेल सहित कई प्रोजेक्ट चल रहे है. पैसो की कमी से प्रोजेक्ट रुके नही है.
महाराष्ट्र – 3600 करोड़ का स्मारक लेकिन कई जरूरी योजनाये अटकी
यहां बन रही है –मुंबई के गिरगाव चौपाटी के पास अरब सागर में महाराष्ट्र सरकार शिवाजी स्मारक बना रही है. 210 मीटर ऊँचे इस स्टेच्यु पर करीब 3600 करोड़ रूपये कर्च किये जायेंगे. अब तक 15 करोड़ 86 लाख रूपये कर्च हो चुके है. शिव स्मारक के लिए राज्य सरकार अपने बजट में हर साल आवंटन दे रही है.
जबकि 200 करोड़ की खेती योजना भी शुरू नही हो सकी
सरकार ने राज्य में गट खेती योजना शुरू करने की घोषणा की थी. 200 करोड़ रूपये चाहिए थे लेकिन अभी तक यह योजना शुरू नही हो पाई है. सरकार ने बजट में कोल्ड वैन योजना और 349 चलते फिरते पशु वेधकीये चिकित्सालय शुरू करने की बात कही कही थी लेकिन यह भी शुरू नही हो पाया है. सरकार के मत्स्य वयवसाय विभाग ने दो साल पहले “चलते फिरते मछली बिक्री केंद्र” शुरू करने की योजना घोषित की थी. यह योजना बजट के आभाव में शुरू नही हो पाई है.

उत्तरप्रदेश- पिजिआई को बहेतर ईलाज के लिए चाहिए 473 करोड़
यहां बन रही है – उत्तरप्रदेश की सरकार की और से प्रमुख धार्मिक नगर अयोध्या में भगवान राम की 108 मीटर ऊँची प्रतिमा स्थापना का प्रस्ताव है. फ़िलहाल प्रतिमा स्थापना क लिए कोई फल नही की गयी है. बजट प्रावधान या लागत का आंकलन नही किया गया है. प्रतिमा पर 150 से 200 करोड़ रूपये कर्च होगा. लोगों से भी चंदा लिया जायेगा.
जबकि इमरजेंसी वार्ड ही नही बन पा रहा है
लखनऊ के पिजिआइ में 250 बेड का इमरजेंसी वार्ड लीवर व किडनी ट्रांसप्लांट सेण्टर का निर्माण शुरू नही हो सका है. इन पर 473 करोड़ का कर्च होना है. ट्रामा सेण्टर की स्थापना के मामले में भी फंड की कमी आड़े आ रही है. जिससे लाखो लोगों को लम्बे समये तक मदद मिल सकती है. इसके साथ ही उत्तर प्रदेश में निर्माणाधीन विधि विज्ञान प्रयोगशाला कन्नौज का भवन फंड न मिलने से पिछले करीब 8 महीने से रुका हुआ है. यह ऐसी दर्जनों योजनाये और है.
दो और मुर्तिया यह भी बन रही है:
तेलंगाना– हैदराबाद से 40 किमी दूर शमशाबाद में संत रामानुजाचार्य की 216 फिट ऊँची प्रतिमा बनाई जा रही है. पूरा प्रोजेक्ट 1000 करोड़ रूपये का है.
जबकि हैदराबाद के पुराने शहर के विकास के लिए तत्कालीन सीएम डॉक्टर वायस राज्सेखर रेड्डी ने 2 हजार करोड़ रूपये के बजट की घोषणा की थी, लेकिन यह अब तक क्रियान्वित नही हो पाई है. वही हैदराबाद में 72 किमी लम्बा दुनिया का सबसे बड़ा मेट्रो प्रोजेक्ट तंगी के चलते अधुरा पड़ा है.
राजस्थान-राजस्थान के नाथद्वारा में 351 फिट की शिव प्रतिमा बन रही है इसका निर्माण एक निजी समूह कर रहा है. करीब 600  मजदूर और 100 मूर्ति बनाने में जूटे है.
जबकि दिल्ली मुंबई इंडस्ट्रियल कोरिडोर व मेट्रो फेज-2 का काम पैसो की कमी चलते आगे नही बढ़ पाया है. डीएमआईसी प्रोजेक्ट 6 वर्षो से फाइलो से भर नही निकल सका है. पैसो का जुगाड़ नही होने के चलते अब सरकार ने प्रोजेक्ट साइज़ घटा दिया है.
(सोर्स- दैनिक भास्कर)

Wednesday, 10 January 2018

मुस्लिम लड़की गीता पढ़े तो ठीक, लेकिन एक हिन्दू लड़की सिर्फ ”आई लव मुस्लिम्स’ लिख दे तो उसे जान देनी पड़ती है!

मुस्लिम लड़की गीता पढ़े तो ठीक, लेकिन एक हिन्दू लड़की सिर्फ ”आई लव मुस्लिम्स’ लिख दे तो उसे जान देनी पड़ती है!


विक्रम सिंह चौहान
गीता पढ़ने वाली एक मुस्लिम लड़की की पिछले दिनों बहुत चर्चा हुई हिन्दू न्यूज़ चैनलों सॉरी हिंदी न्यूज़ चैनलों ने इस पर विशेष स्टोरी की। लड़की का नाम शायद आलिया खान है। न्यूज़ चैनलों ने बताया कि कैसे इस लड़की ने मौलानाओं की बोलती बंद कर दी। एक बारगी मुझे लगा कि दूसरे धर्म के बारे में अच्छा बोलने वाली इस लड़की का सम्मान होना चाहिए। फिर फायरब्रांड पत्रकार अंजना ओम कश्यप सहित अन्य लोगों को इस पर जरूरत से ज्यादा प्रचार से स्पष्ट हो गया कि यहाँ भी इस लड़की के बहाने मुस्लिम ही निशाने पर है।
आज एक खबर आ रही है बेंगलुरु में 20 साल की एक हिन्दू युवती धन्याश्री ने आत्महत्या कर ली. बीकॉम की स्टूडेंट धन्याश्री के सुसाइड की वजह एक व्हाट्सऐप मैसेज था जिसमें उन्होंने लिखा था ‘आई लव मुस्लिम्स’. इस मैसेज के वायरल होने के बाद उसने अपनी जान ले ली। शुक्रवार को वह अपने दोस्त संतोष के साथ चैट कर रही थी। बातचीत के दौरान ही दोनों के बीच जाति और धर्म पर बहस होने लगी।
संतोष के एक सवाल के जवाब में उसने लिखा, ‘मैं मुस्लिमों से प्यार करती हूं’.इस पर संतोष ने मुस्लिमों से कोई भी रिश्ता रखने को लेकर उसे चेतावनी दी। इतना ही नहीं उसने उस बातचीत का स्क्रीनशॉट बंजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद के सदस्यों के साथ भी शेयर किया। ये स्क्रीनशॉट सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। बीजेपी यूथ विंग के अनिलराज ने धन्याश्री के घर जाकर उसे और उसकी मां को धमकाया।
अगले ही दिन धन्याश्री ने सुसाइड कर लिया। धन्याश्री के शव के पास से पुलिस को एक नोट भी मिला। इस नोट में उसने लिखा था कि इस घटना ने उसकी जिंदगी और पढ़ाई-लिखाई बर्बाद कर दी। एक हिन्दू लड़की को सिर्फ ‘मैं मुस्लिमों से प्यार करती हूँ ‘ लिखने पर जान देनी पड़ी। और जान लेने वाला भी हिन्दू ही है और हम बात यहाँ मुस्लिमों के अत्याचार की करते हैं।
मुस्लिम लड़की गीता पढ़े ,भागवत पढ़े ,जय श्री राम बोले तो ठीक है लेकिन एक हिन्दू लड़की सिर्फ ”आई लव मुस्लिम्स’ लिख दे तो उन्हें जान देनी पड़ती है!

जज ने ED से पूछा- जाकिर नाईक ही निशाने पर क्यों? आसाराम जैसे बाबाओं का आपने क्या किया ?

         

जज ने ED से पूछा- जाकिर नाईक ही निशाने पर क्यों? आसाराम जैसे बाबाओं का आपने क्या किया ?

        इस्‍लामिक प्रचारक जाकिर नाईक के मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) को ज्‍यूडीशियल ट्रिब्‍यूनल जज ने फटकार लगाई है। जस्टिस मनमोहन सिंह ने नाईक की अटैच की गई संपत्ति को ईडी के कब्‍जे में देने से मना कर दिया। बता दें की इससे पहले राष्‍ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) को इंटरपोल से उस वक्‍त झटका लगा था जब रेड कॉर्नर नोटिस जारी करने की उसकी अर्जी खारिज कर दी गई थी।
न्यूज़ 18 की खबर के मुताबिक जस्टिस मनमोहन सिंह ने ईडी के वकील से कहा, ‘मैं ऐसे 10 बाबाओं के नाम बता सकता हूं जिनके पास 10 हजार करोड़ रुपये से ज्‍यादा की संपत्ति है और उन पर आपराधिक मामले चल रहे हैं। क्‍या आपने उनमें से एक के खिलाफ भी कार्रवाई की? आपने आसाराम बापू के खिलाफ क्‍या किया?’
ट्रिब्‍यूनल के चेयरमैन ने माना कि ईडी ने पिछले 10 साल में आसाराम की संपत्ति जब्‍त करने को लेकर कोई कार्रवाई नहीं की लेकिन नाईक के मामले में काफी तेजी से काम करती दिख रही है। ट्रिब्‍यूनल ने ईडी के वकील से पूछा कि जब चार्जशीट में ही तय अपराध नहीं बताए गए हैं तो फिर संपत्ति को जब्‍त करने का आधार क्‍या है।
वकील ने कहा कि नाईक ने युवाओं को अपने भाषणों के जरिए उकसाया है। इस पर जस्टिस सिंह ने बताया कि ईडी ने कोई भी प्रथम दृष्‍टया सबूत या किसी भी भ्रमित युवक का बयान पेश नहीं किया है कि किस तरह से नाईक के भाषणों से युवक अवैध कामों में गए।
         https://muslimpatrika.com/sc-questioned-ed-over-zakir-naik/
जस्टिस सिंह ने कहा, ‘क्‍या आपने किसी का बयान दर्ज किया कि वे कैसे इन भाषणें से प्रभावित हुए? आपकी चार्जशीट में तो यह भी दर्ज नहीं है कि 2015 ढाका आतंकी हमले में इन भाषणों की क्‍या भूमिका थी।’ बाद में जज ने कहा कि ऐसा लगता है कि ईडी ने अपनी सुविधा के हिसाब से 99 प्रतिशत भाषणों को नजरअंदाज कर दिया और केवल एक प्रतिशत पर विश्‍वास जताया।
ईडी के वकील से जज ने कहा, ‘आपने वो भाषण पढ़ें जो चार्जशीट में शामिल हैं? मैंने ऐसे बहुत से भाषण सुने हैं और मैं आपको कह सकता हं कि अभी तक मुझे कुछ भी आपत्तिजनक नहीं मिला है।’ इसके बाद ट्रिब्‍यूनल ने यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया और ईडी को चेन्‍नई में स्‍कूल व मुंबई में एक वाणिज्यिक संपत्ति का कब्‍जा लेने से रोक दिया।
ईडी इससे पहले नाईक की तीन संपत्तियों को अटैच कर चुकी हैं और इनमें स्‍कूल और मुंबई की प्रोपर्टी भी शामिल है लेकिन जज ने कहा कि अब ईडी इनका फिजिकल पजेशन नहीं ले पाएगी। इसके बाद ट्रिब्‍यूनल ने सुनवाई टाल दी।

भरी सभा में जिग्नेश मेवानी ने उड़ाया अर्नब गोस्वामी का मजाक

भरी सभा में जिग्नेश मेवानी ने उड़ाया अर्नब गोस्वामी का मजाक



                    दिल्ली की हुंकार रैली में दलित नेता जिग्नेश मेवानी पीएम नरेंद्र मोदी और बीजेपी सरकार पर तो बरसे ही, उन्होंने रिपब्लिक टीवी के संपादक अर्णब गोस्वामी की भी खिल्ली उड़ाई। सभा में मौजूद लोगों को संबोधित करते हुए जिग्नेश ने कहा कि मुझे चार दिन से बहुत तेज सिरदर्द है, आप बता सकते हैं कि मैंने कौन सा न्यूज चैनल देखा है? इसके बाद भीड़ में से लोगों ने रिपब्लिक का नाम लिया। गुजरात के विधायक ने कहा कि हो सकता है आज रात आपको टीवी में ऐसा भी देखने को मिले कि उमर खालिद ने कन्हैया को कुरकुरे का पैकेट क्यों दिया। जिग्नेश के इस बयान पर भीड़ ने जमकर ठहाके लगाये। इसके बाद जिग्नेश मेवानी ने कहा,’ दिस इज लाइव ऑन बनाना रिपब्लिक।’ जिग्नेश ने अपने भाषण की शुरुआत करते हुए कहा कि मनोरंजन भी बहुत जरूरी होता है।
बता दें कि मंगलवार को दिल्ली में आयोजित युवा हुंकार रैली में रिपब्लिक टीवी की एक महिला पत्रकार ने रैली में आए जिग्नेश मेवानी के समर्थकों पर बदसलूकी का आरोप लगाया। रिपब्लिक टीवी की पत्रकार शिवानी गुप्ता ने कहा कि जब वह वहां रिपोर्टिंग कर रही थी तभी जिग्नेश मेवानी की रैली में आए लोगों ने उसके साथ बदतमीजी की, धमकाया और साथ ही सेक्सिस्ट कमेंट भी किये। रिपब्लिक टीवी ने इस मामले में वीडियो जारी किया है।


चैनल ने कहा, ‘ जिग्नेश के गुंडों ने हमारी रिपोर्टर के साथ बेहद बुरा बर्ताव किया है, जिग्नेश का असली चेहरा सबके सामने आ गया है।’ इस वीडियो में दिख रहा है कि जब शिवानी रिपोर्टिंग कर रही होती है तो वहां कुछ लोग आकर नारेबाजी करने लगते हैं। इसके बाद शिवानी को रिपोर्टिंग रोकनी पड़ती है। बाद में पुलिस आकर शिवानी को बाहर निकाल कर ले जाती है।
बता दें कि इस रैली में गुजरात के विधायक जिग्नेश मेवानी ने पीएम मोदी को खूब खरी खोटी सुनाई, और कहा कि देश का युवा अपने लिये नौकरी मांग रहा है, और पीएम ने जो 15 लाख रुपये का वादा किया था वह मांग रहा है। उन्होंने कहा कि वह किसी धर्म और सम्प्रदाय के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन गौ रक्षा और घर वापसी के नाम पर लोगों को बरगलाने वालों के जरूर खिलाफ हैं।

Tuesday, 9 January 2018

*******नेताजी सुभाषचंद्र बोस जीवनी*******

                                  “तुम मुझे खून दो मै तुम्हे आजादी दूंगा”
       स्वतंत्रता अभियान के एक और महान क्रान्तिकारियो में सुभाष चंद्र बोस – Netaji Subhash Chandra Bose का नाम भी आता है। नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने भारतीय राष्ट्रिय सेना का निर्माण किया था। जो विशेषतः “आजाद हिन्द फ़ौज़” के नाम से प्रसिद्ध थी। सुभाष चंद्र बोस, स्वामी विवेकानंद को बहोत मानते थे।

“तुम मुझे खून दो मै तुम्हे आजादी दूंगा” सुभाष चंद्र बोस का ये प्रसिद्ध नारा था। उन्होंने अपने स्वतंत्रता अभियान में बहोत से प्रेरणादायक भाषण दिये और भारत के लोगो को आज़ादी के लिये संघर्ष करने की प्रेरणा दी।

पूरा नाम  – सुभाषचंद्र जानकीनाथ बोस
     जन्म       – 23 जनवरी 1897
       जन्मस्थान – कटक (ओरिसा)
             पिता       – जानकीनाथ
                 माता       – प्रभावती देवी
                     शिक्षा      – 1919 में बी.ए. 1920 में आय.सी.एस. परिक्षा उत्तीर्ण।
सुभास चंद्र बोस भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी नेता थे। जिनकी निडर देशभक्ति ने उन्हें देश का हीरो बनाया। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अंग्रेज़ों के खिलाफ लड़ने के लिये, उन्होंने जापान के सहयोग से आज़ाद हिन्द फौज का गठन किया था।
बाद में सम्माननीय नेताजी ने पहले जर्मनी की सहायता लेते हुए जर्मन में ही विशेष भारतीय सैनिक कार्यालय की स्थापना बर्लिन में 1942 के प्रारम्भ में की, जिसका 1990 में भी उपयोग किया गया था।
शुरू में 1920 के अंत ने बीसे राष्ट्रिय युवा कांग्रेस के उग्र नेता थे एवं 1938 और 1939 को वे भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस के अध्यक्ष बने। लेकिन बाद में कुछ समय बाद ही 1939 में उन्हें महात्मा गांधी / Mahatma Gandhi से चल से विवाद के कारण अपने पद को छोडना पड़ा। लेकिन 1940 में भारत छोड़ने से पहले ही उन्हें ब्रिटिश ने अपने गिरफ्त में कर लिया था। अप्रैल 1941 को बोस को जर्मनी लाया गया।
जहा उन्हें भारतीय स्वतंत्रता अभियान की बागडोर संभाली, और भारत को आजादी दिलाने के लिये लोगो को एकजुट करने लगे और एकता के सूत्र में बांधने लगे।
नवंबर 1941 में, जर्मन पैसो से ही उन्होंने बर्लिन में इंडिया सेंटर की स्थापना की और कुछ ही दिनों बाद फ्री इंडिया रेडियो की भी स्थापना की, जिसपर रोज़ रात को बोस अपना कार्यक्रम किया करते। तक़रीबन 3000 मजबुत स्वयं सेवी सैनिको ने इरविन रोमेल्स द्वारा हथियाए अफ्रीका कॉर्प्स को अपने कब्जे में किया।
बाद में बोस को जर्मन से बहोत सहायता मिली और उन्होंने भारत की खोज के लिये जर्मन जमीन का भी उपयोग किया। इसी दौरान बोस पिता भी बने, उनकी पत्नी और सहयोगी एमिली स्किनल, जिनसे वे 1934 में मिले थे। उन्होंने एक बच्ची को जन्म दिया। 1942 की बसंत से, जापानियों ने दक्षिणी एशिया को हथिया लिया था और वे जर्मन प्राथमिकताओं को बदलने लगे थे। बाद में भारत पर हुआ जर्मन हमला असहनीय बनता गया।
इसे देखते हुए बोस ने दक्षिणी एशिया जाने का निर्णय लिया। अडोल्फ़ हिटलर उसी समय 1942 के अंत में बोस से मिले थे। और उन्होंने भी बोस को दक्षिणी एशिया जाने की सलाह दी और पनडुब्बी लेने की भी सलाह दी। बोस ने अच्छी तरह से एक्सिस ताकत को जान लिया था और खेदसूचक ढंग से वह ज्यादा देर तक नही टिक पाई।
फेब्रुअरी 1943 में बोस जर्मन पनडुब्बियों पर पहुचें। मैडागास्कर में, उन्हें जापानीज पनडुब्बी में स्थानांतरित किया गया। जहा मई 1943 में वे जापानीज स्थान सुमात्रा में उतरे।
जापानियों की सहायता से ही सुभाष चंद्र बोस – Subhash Chandra Bose ने इंडियन नेशनल आर्मी (INA) का पुनर्निर्माण किया। जिसमे ब्रिटिश इंडियन आर्मी के भारतीय सैनिक भी शामिल थे। जिन्होंने सिंगापुर युद्ध में महान कार्य किया था। इस तरह बोस के आने से मलैया और सिंगापुर में भारतीय नागरीकों की संख्या बढ़ने लगी।
बोस के नेतृत्व में जापानीज भारतीय सरकार को विभिन्न क्षेत्रो में सहायता करने के लिये राजी हुए। जैसे की उन्होंने बर्मा की सहायता की थी। और साथ ही जैसा साथ उन्होंने फिलीपींस और मांचुकुओ का दिया था। उन्होंने भारत की अस्थाई सरकार, जिसे बोस प्रतिपादित कर रहे थे, की स्थापना जापानीयो के साथ मिलकर अंडमान और निकबर में की।
बोस अच्छी तरह से अपनी सेना का नेतृत्व कर रहे थे – उनमे काफी करिश्माई ताकत समायी थी। इसी के चलते उन्होंने प्रसिद्ध भारतीय नारे “जय हिन्द” की घोषणा की। और उसे अपनी आर्मी का नारा बनाया। उनकें नेतृत्व में निर्मित इंडियन नेशनल आर्मी एकता और समाजसेवा की भावना से बनी थी। उनकी सेना में भेदभाव और धर्मभेद की जरा भी भावना नही थी। इसे देखते हुए जापानियों ने बोस को अकुशल सैनिक बताया। और इसी वजह से वे अपनी आर्मी को ज्यादा समय तक नही टिका पाये।
1944 के अंत में और 1945 के प्रारम्भ में ब्रिटिश इंडियन आर्मी पहले तो रुकी थी लेकिन बाद में उन्होंने पुनः भारत पर आक्रमण किया। जिसमे लगभग आधी जापानी शक्ति और इंडियन नेशनल आर्मी में शामिल आधे जापानी सैनिक मारे गए। बाद में इंडियन नेशनल आर्मी मलय पेनिनसुला गयी जहा सिंगापुर में उन्हें देखा गया था और उन्होंने स्वयं ही खुद को जापानियों के हवाले कर दिया था। बोस ने पहले जापानियों के डर से आत्मसमपर्ण का निर्णय नही लिया था। बल्कि उन्होंने भागकर मंचूरिया जाने की बजाये सोवियत संघ के भविष्य के लिये आत्मसमर्पण करने की ठानी।
ताइवान में हुए विमान अपघात में उनकी मृत्यु हो गयी थी। लेकिन आज भी बहोत से भारतीयो को इस बात पर विश्वास नही की उनका विमान हादसा वास्तव में हुआ था भी या नही। उस समय हादसे के बाद भी भारतीय बंगाल प्रान्त के लोगो को भरोसा था की बोस भारत की आजादी के लिये दोबारा आएंगे।
रंगून के ‘जुबली हॉल’ में सुभाष चंद्र बोस द्वारा दिया गया वह भाषण सदैव के लिए इतिहास के पत्रों में अंकित हो गया। जिसमें उन्होंने कहा था कि- “स्वतंत्रता बलिदान चाहती है। आपने आज़ादी के लिए बहुत त्याग किया है। किन्तु अभी प्राणों की आहुति देना शेष है।

आज़ादी को आज अपने शीश फूल चढ़ा देने वाले पागल पुजारियों की आवश्यकता है। ऐसे नौजवानों की आवश्यकता है। जो अपना सिर काट कर स्वाधीनता देवी को भेट चढ़ा सकें।
“तुम मुझे ख़ून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा।”
इस वाक्य के जवाब में नौजवानों ने कहा – “हम अपना ख़ून देंगे” उन्होंने आईएनए को ‘दिल्ली चलो’ का नारा भी दिया। सुभाष भारतीयता की पहचान ही बन गए थे और भारतीय युवक आज भी उनसे प्रेरणा ग्रहण करते हैं। वे भारत की अमूल्य निधि थे। ‘जय हिन्द’ का नारा और अभिवादन उन्हीं की देन है।
सुभाष चंद्र बोस के ये घोषवाक्य आज भी हमें रोमांचित करते है। यही एक वाक्य सिद्ध करता है कि जिस व्यक्तित्व ने इसे देश हित में सबके सामने रखा वह किस जीवन का व्यक्ति होगा।
‘इंडियन नेशनल आर्मी’ के संस्थापक नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु पर इतने वर्ष व्यतीत हो जाने के बाद भी रहस्य छाया हुआ है। सुभाषचंद्र बोस की मृत्यु हवाई दुर्घटना में मानी जाती है। समय गुजरने के साथ ही भारत में भी अधिकांश लोग ये मानते है कि नेताजी की मौत ताईपे में विमान हादसे में हुई।
कहा जाता है की 18 अगस्त 1945 को यह हादसा ताइवान में हुआ था। लेकिन फिर भी बहोत से लोगो को इस बात पर भरोसा नही था।
नेताजी सुभाष चंद्र बोस सर्वकालिक नेता थे, जिनकी ज़रूरत कल थी। आज है और आने वाले कल में भी होगी। वह ऐसे वीर सैनिक थे, इतिहास जिनकी गाथा गाता रहेगा। उनके विचार, कर्म और आदर्श अपना कर राष्ट्र वह सब कुछ हासिल कर सकता है, जिसका वह हक़दार है। सुभाष चंद्र बोस स्वतंत्रता समर के अमर सेनानी, मां भारती के सच्चे सपूत थे।
नेताजी भारतीय स्वाधीनता संग्राम के उन योद्धाओं में से एक थे। जिनका नाम और जीवन आज भी करोड़ों देशवासियों को मातृभमि के लिए समर्पित होकर कार्य करने की प्रेरणा देता है। उनमें नेतृत्व के चमत्कारिक गुण थे। जिनके बल पर उन्होंने आज़ाद हिंद फ़ौज की कमान संभाल कर अंग्रेज़ों को भारत से निकाल बाहर करने के लिए एक मज़बूत सशस्त्र प्रतिरोध खड़ा करने में सफलता हासिल की थी।
नेताजी के जीवन से यह भी सीखने को मिलता है कि हम देश सेवा से ही जन्मदायिनी मिट्टी का कर्ज़ उतार सकते हैं। उन्होंने अपने परिवार के बारे में न सोचकर पूरे देश के बारे में सोचा। नेताजी के जीवन के कई और पहलू हमे एक नई ऊर्जा प्रदान करते हैं। वे एक सफल संगठनकर्ता थे। उनकी बोलने की शैली में जादू था और उन्होंने देश से बाहर रहकर ‘स्वतंत्रता आंदोलन’ चलाया। नेताजी मतभेद होने के बावज़ूद भी अपने साथियो का मान सम्मान रखते थे। उनकी व्यापक सोच आज की राजनीति के लिए भी सोचनीय विषय है।

एक नजर में सुभाषचंद्र बोस का इतिहास / Netaji Subhash Chandra Bose History In Hindi

1) 1921 में सुभाषचंद्र बोस / Subhash Chandra Bose इन्होंने सरकारी नोकरी में बहोत उच्च स्थान का त्याग करके राष्ट्रीय स्वातंत्र के आंदोलन में कुद पडे। स्वातंत्र लढाई में हिस्सा लेने के लिये अपनी नौकरी का इस्तीफा देणे वाले वो पहले आय.सी.एस. अधिकारी थे।
2) 1924 में कोलकत्ता महानगर पालिका के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के रूप में उनको चित्तरंजन दासइन्होंने चुना। पर इसी स्थान होकर और कौनसा भी सबुत न होकर अंग्रेज सरकार ने क्रांतीकारोयों के साथ सबंध रखा ये इल्जाम लगाकर उन्हें गिरफ्तार मंडाले के जेल में भेजा गया।
3) 1927 में सुभाषचंद्र बोस और पंडित जवाहरलाल नेहरू इन दो युवा नेताओं को कॉंग्रेस के महासचिव के रूप में चुना गया। इस चुनाव के वजह से देशके युवाओं में बड़ी चेतना बढ़ी।
4) सुभाषचंद्र बोस इन्होंने समझौते के स्वातंत्र के अलावा पुरे स्वातंत्र की मांग कॉंग्रेस ने ब्रिटिशों से करनी चाहिये। ऐसा आग्रह किया। 1929 के लाहोर अधिवेशन में कॉंग्रेस ने पूरा स्वातंत्र का संकल्प पारित किया। ये संकल्प पारित होने में सुभाषचंद्र बोस इन्होंने बहोत प्रयास किये।
5) 1938 में सुभाषचंद्र बोस हरिपुरा कॉंग्रेस अधिवेशन के अध्यक्ष बने।
6) 1939 में त्रिपुरा यहा हुये कॉंग्रेस के अधिवेशन में वो गांधीजी के उमेदवार डॉ. पट्टाभि सीतारामय्या इनको घर दिलाकर चुनकर आये। पर गांधीजी के अनुयायी उनको सहकार्य नहीं करते थे। तब उन्होंने उस स्थान का इस्तीफा दिया और ‘फॉरवर्ड ब्लॉक’ ये नया पक्ष स्थापन किया।
7) इंग्लंड दुसरे महायुध्द में फसा हुवा है। इस स्थिति का लाभ लेकर स्वातंत्र के लिए भारत ने सशस्त्र लढाई करनी चाहिए’ ऐसा प्रचार वो करते थे। इस वजह से अंग्रेज सरकार का उनके उपर का गुस्सा बढ़ा। सरकारने उन्हें जेल में डाला पर उनकी तबियत खराब होने के वजह से उन्हें घर पर ही नजर कैद में रखा। 15 जनवरी १९४१ में सुभाषबाबू भेस बदलकर अग्रेजोंके चंगुल से भाग गये। काबुल के रास्ते से जर्मनी की राजधानी बर्लिन यहा गये।
8) भारत के स्वातंत्र लढाई के लिये सुभाषबाबू ने हिटलर के साथ बातचीत की। जर्मनी में ‘आझाद हिंद रेडिओ केंद्र’ शुरु किया। इस केंद्र से अंग्रेज के विरोध में राष्ट्रव्यापी संकल्प करने का संदेश वो भारतीयोंको देने लगे।
9) जर्मनी में रहकर भारतीय स्वतंत्र के लिये हम कुछ महत्वपूर्ण रूप की कृति कर सकेंगे। ऐसा ध्यान में आतेही सुभाषचंद्र बोस जर्मनी से एक पनडुब्बी से जपान गये। रासबिहारी बोस ये भारतीय क्रांतिकारी उस समय जपान में रहते थे। उन्होंने मलेशिया, सिंगापूर, म्यानमार आदी। पूर्व आशियायी देशों में के भारतीयोका ‘इंडियन इंडिपेंडेंट लीग‘ (हिंदी स्वातंत्र संघ) स्थापन किया हुवा था।
जपान इ हिंदी के हाथ में आये हुये अंग्रेजो के लष्कर में के हिंदी सैनिकोकी ‘आझाद हिंद सेना’ उन्होंने संघटित की थी। उसका नेतृत्व स्वीकार करने की सुभाषबाबू को रासबिहारी बोस ने उन्होंने आवेदन किया। नेताजीने वो आवेदन स्वीकार किया। इस तरह सुभाषचंद्र बोस आझाद हिंद सेने के सरसेनापती बने।
10) 1943 में अक्तुबर महीने में सुभाषबाबू के अध्यक्षता में ‘आझाद हिंद सरकार’ की स्थापना हुयी। अंदमान और निकोबार इन व्दिपो कब्जा कटके आझाद हिंद सरकार ने वहा तिरंगा लहरा दिया। अंदमान को ‘शहीद व्दिप’ और निकोबार को ‘स्वराज्य व्दिप’ ऐसे नाम दिये। जगन्नाथराव भोसले, शहनवाझ खान, प्रेम कुमार सहगल, डॉ. लक्ष्मी स्वामीनाथन आदी उनके पास के साथी थे। डॉ. लक्ष्मी स्वामी नाथन ये ‘झाशी की राणी’ पथक के प्रमुख थी।
‘तिरंगा झेंडा’ ये आझाद हिंद सेन का निशान ‘जयहिंद’ ये अभिवादन के शब्द, ‘चलो दिल्ली’ ये घोष वाक्य और ‘कदम कदम बढाये जा’ ये समरगित था। इसी सेना ने 1943 से 1945 तक शक्तिशाली अंग्रेजों से युध्द किया था तथा उन्हें भारत को स्वतंत्रता प्रदान कर देने के विषय में सोचने को मजबूर किया।
11) जपान सरकार के निवेदन के अनुसार सुभाषचंद्र बोस एक विमान से टोकियो जाने के लिये निकले उस विमान को फोर्मोसा मतलब ताइहोकू व्दिप के हवाई अड्डे के पास दुर्घटना हुयी। इस दुर्घटना में 18 अगस्त 1945 को नैताजी की मृत्यु हो गयी।
बचपन से ही सुभाष में राष्ट्रीयता के लक्षण प्रकट होने लगे थे और निस्वार्थ सेवा भावना उनके चरित्र की विशेषता थी। इन सभी उदात्त प्रवुत्तियों से ही उनके क्रांतिकारी पर उदार व्यक्तित्व का निर्माण हुआ था।

नियोग की पद्धति

              नपुंसक पति की इच्छा से जुड़ी है          'नियोग' की पद्धति

          नियोग का अर्थ 'नियत करना या काम में लाना होता है।

                अर्धनारीश्वर मंदिर में होने वाले धार्मिक  ‘नियोग’ से संबंधित है। जिसका पति कभी संतान को जन्म नहीं दे पाएगा इसलिए वह अपने पति की मर्जी के बिना ही संतान को जन्म देने के लिए ‘नियोग’ का सहारा ले लेती है।
               खैर हमारा उद्देश्य किसी भी प्रकार की बहस का हिस्सा बनकर, सही या गलत जैसे निष्कर्ष पर पहुंचने का नहीं है। हम तो बस आपको भारत की इस प्राचीन परंपरा ‘नियोग’ से अवगत करवाने की कोशिश कर रहे हैं।  अगर कोई पुरुष वीर्यहीन या नपुंसक है तो उसकी पत्नी को संतान के जन्म के लिए एक अन्य विवाह करने की अनुमति तो नहीं, लेकिन गर्भाधान करने के लिए एक समगोत्रीय पुरुष के साथ शारीरिक संबंध स्थापित करने की सुविधा जरूर उपलब्ध करवाई जाती थी। इस सुविधा को ‘नियोग’ के नाम से जाना जाता है। जिसका आशय किसी भी प्रकार के यौन आनंद  देने से है। नियोग के लिए किस पुरुष को चुना जाएगा, इसका निर्णय भी उसका पति ही करता था। 

‘नियोग’ भारतीय समाज में व्याप्त एक बेहद प्राचीन परंपरा है, जिसकी उपस्थिति रामायण से लेकर महाभारत काल तक मिलती है। आज भी बहुत से भारतीय समुदायों में ‘नियोग’ द्वारा संतानोत्पत्ति की प्रक्रिया को पूरी धार्मिक परंपरा के अनुसार अपनाया जा रहा है। सर्वप्रथम नियोग को मनुस्मृति में उल्लिखित किया गया था। जिसके अनुसार यह एक ऐसी प्रक्रिया है जब पति की अकाल मृत्यु या उसके संतान को जन्म देने में अक्षम होने की अवस्था में स्त्री अपने देवर या फिर किसी समगोत्रीय, उच्चकुल के पुरुष के द्वारा गर्भ धारण करती है।स्त्री अपने पति की इच्छा और अनुमति मिलने के बाद ही ऐसा कर सकती है।नियोग के द्वारा जन्म लेने वाली संतान, नाजायज होने के बावजूद भी जायज कहलाती है। उस पर उसके जैविक पिता का कोई अधिकार ना होकर उस पुरुष का अधिकार कहलाया जाएगा, जिसकी पत्नी ने उसे जन्म दिया है।

            भारतीय पौराणिक इतिहास में नियोग की महत्ता को इस बात से बेहतर समझा जाता है कि जिस प्रकार रामायण के बिना एक आदर्श जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती उसी प्रकार नियोग के बिना महाभारत की कल्पना कर पाना असंभव है।
महाभारत में विचित्रवीर्य की अकाल मृत्यु हो जाने के बाद उसकी दोनों पत्नियों, अम्बिका और अम्बालिका नियोग का सहारा लेकर संतान को जन्म देती हैं। इस प्रक्रिया के लिए वेद व्यास को नियुक्त किया जाता है। धृतराष्ट्र और पांडु का जन्म नियोग द्वारा हुआ था।
इसके अलावा अपने पति पांडु के संतान को जन्म देने में अक्षम होने की अवस्था में उसकी पत्नी कुंती नियोग के जरिए पांडवों को जन्म देती है। माइथोलॉजी के अनुसार, इस नियोग में नियुक्त किए गए पुरुष विभिन्न देवता थे। कुंती के अलावा पांडु की दूसरी पत्नी माद्री ने भी नियोग के सहारे ही नकुल और सहदेव को जन्म दिया था। पौराणिक कहानियों के प्रसिद्ध लेखक देवदत्त पटनायक की किताब ‘दी प्रेग्नेंट किंग’ में भी सूर्यवंशी राजा युवनाश्व की कहानी दर्शायी गई है, जो तीन पत्नियों के बावजूद संतान को जन्म नहीं दे पा रहा था। ऐसे में युवनाश्व के महल में ‘नियोग’ के द्वारा संतान को जन्म देकर वंश को आगे बढ़ाने की बातें उठने लगी थीं। महाभारत और रामायण काल से इतर, भारत के इतिहास में कुछ ऐसे पन्ने भी दफ्न हैं, जो भले ही नियोग से जुड़े रहे लेकिन पुरुषत्व पर चोट ना पहुंचे, इसलिए उन कहानियों को दबा दिया गया। कई ऐसे राजा-महाराजा हुए जिन्होंने खुद अक्षम होने की हालत में अपने बेहद विश्वसनीय सहयोगी या सेवक को नियोग के लिए नियुक्त किया।




















































































यूपी के मदरसों ने भी किया पीएम की तस्वीर लगाने से इनकार

यूपी के मदरसों ने भी किया पीएम की तस्वीर लगाने से इनकार

लखनऊ 
                  उत्तराखंड के मदरसों + में पीएम की तस्वीर लगाने से इनकार करने के बाद अब उत्तर प्रदेश के मदरसों ने भी पीएम की तस्वीर लगाने से इनकार कर दिया है। देवबंद के मुस्लिम शैक्षिक संस्थानों ने सरकार से माफी मांगते हुए कहा है कि मदरसे में तस्वीर लगाना इस्लाम के खिलाफ है।

                  हुसैनिया मदरसा के मुख्य मुफ्ती तारिक काजमी ने कहा कि वे लोग कोई भी तस्वीर उनके संस्थानों में नहीं लगाते हैं। यहां तक कि उनके धार्मिक नेताओं की तस्वीर भी नहीं लगाई जाती है फिर वे प्रधानमंत्री की तस्वीर कैसे लगा सकते हैं? उन्होंने कहा कि वह इसके लिए माफी मांगते हैं। नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं और उन्हें देश की एकता के लिए काम करना चाहिए।

               काजमी ने कहा कि वह उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के बयान के खिलाफ हैं, जिसमें उन्होंने पीएम की तस्वीर न लगाने वाले मदरसे की आलोचना की है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री + की तस्वीर सरकारी विभागों में लगाने का नियम है। मदरसों को इन सारी रूढ़िवादी बातों से दूर रखना चाहिए। 

             काजमी ने कहा कि किसी को भी इस तरह की मांग नहीं करनी चाहिए। यह सब उनके धर्म के खिलाफ है। सरकार जब कोई आदेश देती है, तो उन्हें आदेश इस तरह से देना चाहिए कि किसी की धार्मिक + भावनाएं आहत न हों। उन्हें विकास पर ध्यान देना चाहिए न कि लोगों को आपस में बांटने पर।  

Monday, 8 January 2018

Muslim or india










ब्रिटेन में तेज़ी से फैलता इस्लाम

          ब्रिटेन में तेज़ी से फैलता इस्लाम- नये इस्लाम कबूल करने वालों की संख्या 1 लाख से ज़्यादा


ब्रिटेन में आम लोग तेज़ी से इस्लाम की ओर आकर्षित हो रहे हैं, पिछले कुछ सालों में एक लाख से अधिक लोगों ने इस्लाम कुबूल किया है।

उनमें बहुमत गोरे नौजवान महिलाओं की है जबकि पिछले साल 5 हजार से अधिक ब्रिटिश इस्लाम में दाखिल हुए हैं। पिछले दस साल के मुकाबले में ब्रिटेन में इस्लाम कुबूल करने वाले लोगों की संख्या में वृद्धि दो गुणी हो गई है। उनमें बहुमत गोरी नौजवान महिलाओं की है, जो समाज की अविश्वसनीय रवैया और भौतिकवाद से परेशान हैं।

यह महिलाएं आत्मा की शांति की तलाश में थीं जो उन्हें इस्लाम में मिला। ब्रिटेन में बहु धार्मिक संस्था ‘फेथ मीटर्ज़’ ने एक लंबे सर्वे के बाद कहा है कि ब्रिटेन में इस्लाम तेज़ी से फ़ैल रहा है और उसे कुबूल करने वाली महिला व पुरुष के मुताबिक इस्लाम पर अम्ल करते हुए ब्रिटेन में रहा जा सकता है क्योंकि यह समाज से मुकम्मल संबंध रखता है।
गौरतलब है कि पूर्व ब्रिटेन प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर की साली लोरेन बोथ ने जब इस्लाम कुबूल किया तो उसके बाद भी इस्लाम धर्म के दायरे में दाखिल होने का रुझान बढ़ा और ब्रिटेन मीडिया में इसका बहुत चर्चा हुआ था।

विवाहित महिला को देखकर कामुक हुए, गंवानी पड़ी सत्ता

विवाहित महिला को देखकर कामुक हुए, गंवानी पड़ी सत्ता

इन्द्र देवताओं के राजा हैं। ऋग्वेद में इन्हें सभी देवताओं से शक्तिशाली और प्रभावशाली बताया गया है। इनका निवास स्थान स्वर्ग है जहां एक से एक सुंदर अप्सराएं हैं जो इन्द्र का मनोरंजन करती हैं। इसके बावजूद भी देवराज इन्द्र पृथ्वी की एक कन्या को देखकर मोहित हो गए।
इनका मन उस कन्या को पाने के लिए तड़प उठा और काम भावना से पीड़ित इन्द्र उनसे संबंध बनाने के लिए आतुर हो गए। लेकिन समस्या यह थी की, कन्या गौतम ऋषि की पत्नी थी। इन्द्र ताक में रहने लगे कि कब ऋषि गौतम कुटिया में न हों और वह ऋषि पत्नी अहिल्या से संपर्क बना सकें।

एक रात इन्द्र मध्यरात्रि में मुर्गे की आवज में बांग देने लगे। ऋषि गौतम को लगा कि ब्रह्म मुहूर्त हो गया है और वह कमंडल लेकर स्नान करने नदी की ओर चल पड़े। इन्द्र ने माया से ऋषि गौतम का वेष बनाया और पहुंच गए अहिल्या के पास।

गौतम बने इन्द्र ने अहिल्या से प्रेम निवेदन करना शुरु किया। देवी अहिल्या इन्द्र के असली रुप को पहचान नहीं सकीं। पति समझकर इन्द्र के प्रेम निवेदन इन्होंने स्वीकार कर लिया। इन्द्र की कामुक इच्छा पूरी हो गई तब वह कुटिया से निकलकर जाने लगा।

उसी समय गौतम ऋषि पहुंच गए। इन्होंने इन्द्र को अपनी कुटिया से निकलते देखकर जान लिया कि इन्द्र ने इनकी पत्नी के साथ पाप कर्म किया है। क्रोधित होकर ऋषि गौतम ने इन्द्र को शाप दे दिया कि तुम्हें अपना राज पाट गंवाना पड़ेगा।

कुछ ही समय बाद असुरों ने देवलोक पर आक्रमण किया और इन्द्र को स्वर्ग से भागना पड़ा।

    ब्रह्मा ने अपनी ही पुत्री से विवाह क्यों किया था जाने

आपको पता है की इस श्रस्टि का निर्माण ब्रह्मा जी ने किया था लेकिन ब्रह्मा जी की पत्नी कौन थी इसका आपको पता नही होगा आपको बतादे की ब्रह्मा जी ने अपनी ही पुत्री से शादी की थी और उनकी पुत्री का नाम सरस्वती था  जिसे आज विधा की देवी कहा जाता है आपको यक़ीन नही हो रहा होगा लेकिन ये सच ब्रह्मा जी ने अपनी ही बेटी से शादी की थी लेकिन ब्रह्मा जी ने इस क्यों किया था जाने !
ब्रह्मा जी ने ऐसा क्यों किया था इस बात की पुस्टि हमारे दो अलग अलग धार्मिक ग्रंथो में मिलती है उनके नाम है सरस्वती पुराण और मत्स्य पुराण मत्स्य पुराण इनमे ऐसा कहा जाता है की ब्रह्मा जी ने सरस्वती से अपने विवाह का प्रस्ताप रखा था उसके बाद इन दोनों ऐ एक पुत्र पैदा हुआ था जिसका नाम मनु था लेकिन ब्रह्मा जी ने अपनी ही पुत्री से ये अनीति पूर्ण काम क्यों किया इस बात का पता लगा ने के लिए हम आपको इन दोनों ग्रांट के बारे में बताते है !

सरस्वती पुराण  !   मत्स्य पुराण  आपको पता है की सरस्वती को विधा की देवी कहा जाता है और ये देवी इतनी सुंदर थी की इसकी सुंदरता को देख कर इन के पिता ब्रह्मा भी अपने आप को काबू में नही कर सके जबकि ब्रह्मा जी ने खुद ही अपने सकती से सरस्वती को उत्पन्न किया था लेकिन उनकी सुन्दरता को देख कर ब्रह्मा जी ने इन्हें अपनी पत्नी बनाने का विचार किया था लेकिन सरस्वती उनकी इस चाल को समझ गई !

सरस्वती ने अपने पिता की इस चाल से बचने के लिए एक बिचार किया था और बो भाग कर चारो दिशाओ में छिपती रही लेकिन ब्रह्मा जी की नजरि से दूर नही जिसकी आखिर ब्रह्मा जी ने उन्हें एक दिन ढूढ़ ही निकाला उसके बाद सरस्वती ने अपनी हार मान ली और अपने पिता से शादी करली शादी करने के बाद ये दोनों एक जंगल में 100 बर्षो तक रहे थे इसी बिच सरस्वती ने एक पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम मनु रखा गया था !



   चार साल में सबसे कम GDP ग्रोथ, रवीश बोले, चॉकलेट खाने के पैसे भले न हो, मगर दस रुपये का नया नोट चाकलेटी रंग का होगा।

रवीश कुमार
जीडीपी ग्रोथ चार साल में सबसे कम है। एनडीए सरकार के दौर में यह सबसे कम है। 2016-17 में 7.1 था। 2017-18 में 6.5 प्रतिशत रहा है। 2013-14 में 6.4 प्रतिशत से मात्र .1 प्रतिशत ज़्यादा। दोनों मुख्य कारण वही हैं जो सरकार नहीं मानती है। सरकार ने नोटबंदी के दूरगामी प्रभाव को अच्छा बताया था मगर इसके दूरगामी प्रभाव से अर्थव्यवस्था को लँगड़ी लग गई है। दूसरा कारण जीएसटी भी है। नोटबंदी सनक भरा फैसला था और इसे लेकर लोग आज तक उल्लू बने हुए हैं। उनकी मर्ज़ी।
CSO, central statistical office ने शुक्रवार को यह अनुमान जारी किया है। कृषि में भी विकास दर आधी से अधिक गिरने वाली है। 2016-17 में 4.9 प्रतिशत से 2017-18 में 2.1 प्रतिशत रहेगी। आँकड़े बताते हैं कि गाँवों में भयंकर संकट है। अंग्रेज़ी में massive rural stress लिखा है। आज तक सरकार नोटबंदी का फायदा आपके सामने नहीं रख पाई। डिजिटल ट्रांजेक्शन की बात करती है पर वो तो बिना नोटबंदी के भी हो सकता था। कुछ तो खेल है जो सरकार नहीं बता पा रही या फिर भोली जनता को समझ नहीं आ रहा है।
भारत में प्रति व्यक्ति आय में 8.3 प्रतिशत की दर से ही वृद्धि होने का अनुमान है। 2016-17 में 9.7 प्रतिशत की दर से बढ़ी थी। कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह ने साढ़े तीन साल बर्बाद हो जाने के बाद राज्य सभा में माना है कि किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं मिल रहा है। देवेंद्र शर्मा कब से ये बात कह रहे हैं।
सरकार पर वित्तीय दबाव बढ़ता जा रहा है। अब वह रिजर्व बैंक ले इस साल अतिरिक्त पैसा मांग रही है। मौजूदा वित्त वर्ष की तीसरी तिमाही में बैंकों को 250 अरब डॉलर नुक़सान होने का अंदेशा है। नोटबंदी जैसी मूर्खतापूर्ण फैसले की वजह से हो रहा है यह मत पूछिएगा। अब इतिहास ही नोटबंदी के फैसले को मूर्खतापूर्ण साबित करेगा। इसका नुक़सान करोड़ों लोगों ने रोजगार गँवा कर और कमाई घटाकर उठाया है। चुनावी जीत नोटबंदी की जीत नहीं है।
स्टेट बैंक आफ इंडिया ने संकेत दिया है कि न्यूनतम बैलेंस पर लगने वाली जुर्माना राशि पर विचार करेगा। क्या इसे मुख्य धारा की मीडिया ने उठाया था या सोशल माडिया ने ? बताया गया है बैंक इस फैसले की आलोचना से प्रभावित हुआ है ! चॉकलेट खाने के पासे भले न हो, मगर दस रुपये का नया नोट चाकलेटी रंग का होगा। नौटंकी कम नहीं होनी चाहिए।
(लेखक जाने माने पत्रकार हैं, यह लेख उनके फेसबुक पेज से लिया गया है)

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